चलते चलते सर उठाया तो पत्तों के बीच से छान रहा था
आसमान ख़ुशियों भरा
हरित फलित वृक्ष खड़ा था अपनी जड़ें धरती में ख़ूबाये
अपने हाथ आकाश की ओर उठाए
रुक कर जब मैंने जब पत्तों की ओट से
छन-छन कर आते नभ को देखा
वो नीचे आता प्रतीत हुआ - जैसे की लालायित धरती को गले लगाने
उस में पूरी तरह समा जाने
धरती स्थिर- घूमती हुई पर फिर भी एक लाइलाज तड़प कि हक़दार
दूर क्षितिज में दीख पड़ा उनका मिलन
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