November 18, 2025

Kshitij

 चलते चलते सर उठाया तो पत्तों के बीच से छान रहा था 

आसमान ख़ुशियों भरा 

हरित फलित वृक्ष खड़ा था अपनी जड़ें धरती में ख़ूबाये 

अपने हाथ आकाश की ओर उठाए

रुक कर जब मैंने जब पत्तों की ओट से 

छन-छन कर आते नभ को देखा 

वो नीचे आता प्रतीत हुआ - जैसे की लालायित धरती को गले लगाने

उस में पूरी तरह समा जाने 

धरती स्थिर- घूमती हुई पर फिर भी एक लाइलाज तड़प कि हक़दार

दूर क्षितिज में दीख पड़ा उनका मिलन

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